Sunday, April 24, 2011

अंत

इस दर्द का अंत ज़रूर होगा
ज़िंदगी का सवेरा ज़रूर होगा
माना बहुत काली थी ये रात
दर्द भरी थी हर बात
लकिन खुशी का उजाला ज़रूर होगा

बुजदिल थे वो लोग जो अपनी बेवफ़ाई को
मजबूरी का नाम दे गए
जीते जी ज़िंदगी को
कफ़न की दुकान बना गये
कभी ना दे सकते हैं तुम्हे आंसू ये कह कर
आँखो में सिर्फ़ आंसू छोड़ गए

हर अंत की तरह इस अंत के बाद
एक नई शुरूवात होगी
ज़िंदगी में फिर से मीठे सपनो
की बरसात होगी
मुस्कुरा कर आएगी नई सुबह
भूला कर वो गम दे जाएगी
सिर्फ़ खुशी खुशी ओर खुशी की दुआ.......

Wednesday, March 16, 2011

साथ

एक चमक दिखी
भागने लगा मैं
प्यार से मुँह मोड़
झूठी खुशी
ढूँढने लगा मैं

तेरी हर रुदन
सुनने के बाद भी बेवफा हो गया मैं
इतना दर्द देकर तुझे
अपने लिए खुशिया बटोरने चला मैं

आधे रास्ते में साथ छोड़
रास्ता बदल गया मैं
इतनी ठोकर खा कर भी
उस चमक के पीछे भागता रहा मैं

जानता था तू हमेशा देगा साथ
फिर भी दुसरो के साथ की खातिर
तेरे साथ छोड़ गया मैं......

कितनी दूर निकल गया में
दिल में दर्द भर कर खुद
तन्हा हो गया मैं........
ज़िंदगी से हर उम्मीद छोड़
रास्ते में खो गया में...

मेरे रास्तो में तुझे पाकर
समझ नहीं पाया मैं.........
जब समझ आया तेरा प्यार
सब कुछ खो चुका था मैं..

मुझसे इतने आँसू पाकर भी
तूने सिर्फ़ मेरी हर हंसी की प्रार्थना की
कैसे कर सकता था खुदा भी अब
तुझसे मुझे ओर जुदा.........

आज सब कुछ हार कर
ज़िंदगी में सब कुछ लूटा कर
जीता सा लगा मैं....
तुझसे मिलकर बस सब पा गया था मैं..
तेरे साथ के सिवा बस कुछ ओर नहीं चाहता मैं....
कुछ ओर नहीं चाहता मैं............

Tuesday, February 22, 2011

दिल की दुश्मनी

दिल ने ये आँखो से
कैसी दुश्मनी थी कर डाली....
आँखो ने माना दिल को
प्यार में था फसाया..............
मगर दिल भी कहा कम था दर्द से
उसने आँसू को बनाया ओर आँखो
को प्यार में रुलाया...............

Monday, October 25, 2010

दुनिया कहती हेँ

दुनिया कहती हेँ
बड़ा मुश्किल हेँ उस मोड़ का आना
जहा दो राह में से हो एक राह को चुनना

पर मेरी ज़िंदगी कब तक तू उसी एक राह पर चलेगी
कब तक उस मोड़ का इंतेज़ार करवाएगी
जहा मेरी लिए भी दो राहें खड़ी मिलेंगी

उस समय बिना सोचे समझे
पकड़ लूँगा में दूसरी राह
क्योंकि इस राह में ना तो सफ़र
अच्छा मिला ना साथ चलने वाला मुसाफिर

ओर अगर फिर भी उस राह में
कांटो भरा सफ़र मिला
तो भी दुख ना होगा किसी बात का
क्योंकि उन सब का तज़ुर्बा
मेरे पास पहेले से हेँ..........

Thursday, September 16, 2010

वक़्त

कांटो भरी राहें हो जब
हर पल एक सदिया लगे जब
बूँद बूँद आँसू अंदर ही अंदर रिसे जब
ओर कुछ नही इसी को कहते हें बुरा वक़्त

बहुत मुश्किल हें इस वक़्त में अपने आप को संभालना
इन आँसुओ की बूँदो को छलकने से रोकना
दिल को मनाना ओर आँखो को समझाना
ओर पीछे मूड कर ना देख आगे बढ़ जाना

ज़रूरी हें इस वक़्त का भी आना
सच्चे झूठे की पहचान करवाना
ओर ज़िंदगी का असली चेहरा दिखाना
जो बोलते थे बहुत कुछ
उनका सच भी तो सामने लाना

ऐसा नही हें की ये कटेगा नही
ओर ये थमा सा वक़्त बढ़ेगा नही
शायद थोड़ी सी देर लगेगी
लेकिन सूरज की नई किरण ज़रूर दिखेगी

फिर भी इतना पराया नही हें ये दुख
इसी दुख ने ही तो एक अपना दिया
इतने बेरंग रंगो में भी
एक खूबसूरत रंग उभार दिया
बंद कर दुख का ये द्वार
एक खुशी का नया द्वार खटका दिया

अगर बुरा वक़्त ही खूबसूरत लगने लगेगा
कुछ ना पास होते हुए भी कुछ खोने का डर लगेगा
तो सोचो अच्छा वक़्त कितनी खुशिया लाएगा
भूला कर सारे गम खुशियो की छाव दे जाएगा

Thursday, April 29, 2010

समझ

आँखो में आँसू होना ही
क्या गम की निशानी हें
कही बार चेहरे की मुस्कुराहट
भी कहती एक कहानी हें

क्या रोना उनके लिए
जो आए सिर्फ़ गम देने हें
सीख कर उनसे भी एक पाठ ज़िंदगी का
उनके भी हम शुक्रगुज़ार हो चले हें

कभी धूप में कभी छाव् में
ज़िंदगी के हर बहाव में
बहना सीख चुके हैं
गमो क इस कशमश में कश्ती बना के
तेरना सीख चुके हैं

ज़िंदगी जीने की दी हो कितनी भी क़ीमत
मगर अब भी डगमगा कर
संभलने की हें हिम्मत

तो क्या हुआ अगर दिल टूटा हेँ
हमने भी मन को समझा लिया
ये गम तो झूठा हें
अगले मोड़ पर खुशी कर रही होगी इंतज़ार
हम भी अब आगे बढने को हैं बेकरार
ज़िन्दगी अब तू कुछ भी कर
हमने भी कर लिया हैं तुजसे प्यार

Friday, April 9, 2010

दो राहे


क्यू असमंजस में पड़ जाता हूँ
हर मोड़ पर दो राहें पाता हूँ.
किस राह को पकडू ओर किस राह को छोड़ू
कैसे इस गहरी सोच को तोड़ू

बदते कदमो के साथ
क्यू कुछ पीछे छूट जाने का होता हें एहसास
दोनो राहें ले जाती किसी डगर की ओर
बस एक की हें मंज़िल ओर एक का हें ना कोई छोर


क्या किया क्यू किया इस कशमकश में
छिड़ जाती दिल ओर दिमाग़ की तार
बस इन्ही दो राहो ने समेट रखा हें ज़िंदगी का सार

Sunday, November 22, 2009

मैं

अपनी तलाश में निकला मैं
किस आस में निकला मैं
एक हलचल शांत करने निकला मैं
एक समुंदर सी प्यास मिटाने निकला मैं

जान कर भी अंजान बन गया मैं
रोज एक मौत देख कर भी
झूठी ज़िंदगी जीने चला मैं
मंज़िल क पास पहूँचते ही
हिम्मत हार गया मैं

सही मार्ग पर कदम रख कर
भी भटक गया मैं
बढकर आगे रुक गया मैं
बहुत कुछ था कहने को
फिर भी निशब्द हो गया मैं
मुस्कुराने की चाहे मैं
रोता चला गया मैं
प्यार पाने की चाहे मैं
प्यार ठुकरता चला गया मैं


तेरे पास आ कर भी
अपनी "मैं" न्ही भूल पाया "मैं"
पास होते होते दूर हो गया मैं
वक़्त से रंजिश कर
ज़िंदगी से हार गया मैं
सब कुछ पा कर भी
रो बेठा मैं

तेरे पास होने क एहसास से खिल गया मैं
ये कैसा हारा था मैं
की हार कर भी जीता हुआ सा लगा मैं
सब गम भूल कर मुस्कुरा गया मैं
तेरे हाथ आगे बदाते ही
भूल कर अपनी "मैं"
बस मानो अब ओर कुछ ना चाहता था मैं

Tuesday, November 3, 2009

तुम

तुम रूठें तो मनाने न्ही आऊगा
दिल टूटा तो भी बताने न्ही आऊगा
कितना प्यार हे तुमसे जताने न्ही आऊगा
दर्द भरा दिल दिखाने न्ही आऊगा

इतना समज लेना सिर्फ़
प्यार न्ही ज़िंदगी दी हे तुम्हे
तुम्हारा साथ इन सांसो से जुड़ा हे
साँसे चली गई तो ज़िंदा रहना का
नाटक करने न्ही आऊगा

Friday, September 18, 2009

अन्तिम यात्रा

क्यू रो पड़ी तुम मा
मेरी ये अन्तिम यात्रा देख कर
ये अंत न्ही एक शुरूवात हें
कैसे समझाऊ यहा थमी न्ही
यहा से शुरू एक नई सौगात हें

इतना दर्द दिया था मेने दुनिया में आते आते
बस ये अब आख़िरी दर्द दे रही हू जाते जाते
इन आन्सौओ का भी बोझ न्ही ले पाओँगी में
इस दर्द को लेकर इतना लंभा सफ़र न्ही कर पओगि में

जहा में चली हू वाहा भी मेरे कुछ अपने हें
बस कोई बंधन न्ही खुले सब रिश्ते हें
जब में थी तब लगता था सब सुना ओर अकेला
लकिन आज मेरे जाने पर कैसा लगा हें ये मेला

कितना हल्का पन हे यहा
ना कोई गम ना दुख का हे समा
छोड़ आइ हू में पीछे सब वाहा
ओर एक यात्रा ख्तम कर चल पड़ी दुसरे जॅहा

एक रोशिनी ने मुझे खीचा अपनी ओर
न्ही चल रहा मेरा वाहा कोई ज़ोर
इस बंधन से न्ही छूटना मुझे अब
इस बंधन क लिए ही छोड़ आई में पीछे सब
ओर समज गई में जीने का मतलब अब

P.S:-Please Ignore spelling mistakes

Monday, August 17, 2009

वौ नाहि जानते शायाद

जीतना उनकी आदत होगी
झूकना तो वो भूल गये होगे
उचाईया छूना ही उनके अरमान होगे
तकदीर के साथ लड़ना उनका शोक होगा
वो न्ही जानते शायद की खोखली खुशियो मे जीना तो हार है
प्यार के लिए झूकना ही असली जीत है
किसी हारे हुए को उठाना एक ज़िंदगी की उचाई हॅ
कुछ नही पास फिर भी गमो को हरा देना सबसे बड़ी लड़ाई है
आँसू है आँखो मे फिर भी मुस्कुराना ही ज़िंदगी की सचाई है

Wednesday, August 12, 2009

क्या

क्यू सब कुछ बटोरने के बाद
कुछ ख़ालीपन सा लगा ज़िंदगी
किसी चमक के पीछे भागता रहा में ज़िंदगी
मेने जो भी पाया मुझे अपने पर नाज़ था
लकिन फिर भी क्यू खुशियो को मुझसे ऐतराज था

एक बड़ी खुशी के इंतेज़ार में
हर छोटी खुशी को रोंडता रहा
क्या ऐसा था की सब कुछ पाने के बाद
में कुछ चुप चाप ढ़ूढता रहा

कहा भूल आया था में अपनी मुस्कुराहट
न्ही सुन सका में ज़िंदगी की आहट
बस उलझता रहा इन बड़े बड़े सवालो में
समझ न्ही पाया की ज़िंदगी
तूने समझा दिया सब कुछ इन छोटी छोटी बातों में

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