Tuesday, March 24, 2009

दिल के अरमान आँसुओं में बह गये

दिल के अरमान आँसुओं में बह गये
रोज ऑफीस आने के बाद भी सारे काम अधूरे रह गये
ज़िंदगी भी बोरियत की दुकान बन गई
सारा काम करके भी अप्रेज़ल की शकल को तरस गये
शायद ये आखरी बार पड़ेगी गालिया
हर गाली ये सोच कर सह गये

खुद की नींद की भी दी क़ुर्बानी
पास के ढाबा वाले की चाय पर भी करी कितनी मेहरबानी
सुबा से शाम तक 6 बजने क इंतेज़ार मे हर सितम सह गए
हमारी ओर प्रमोशन के बीच मे फ़ासले ही रह गए
दिल के अरमान आँसुओं में बह गए

18 comments:

  1. bhut acchi rachna

    gargi
    www.feelings44ever.blogspot.com

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  2. बहुत सुन्दर बात कही, हम जब कालेज में थे हमें भी ऐसा ही लगता था!

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  3. नेहा जी हिंदी जगत में आपका खासा स्वागत है... आप बेहतर लिखे और इसे जारी रखे यही उम्मीद करता हूँ....

    अर्श

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  4. दिल के अरमान आँसुओं में बह गये

    जैसी माह्न कवित आप ने लिखी
    अच्च है

    लोगो ने पधी और ...............

    कवित

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  5. आप भी ना नेहा जी.....अलबत्त करती हैं.....दिल के अरमा ऐसे-ऐसे..........खैर रचना हास्यपूर्ण है और शायद इसीलिए अच्छी भी है....!!

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  6. अच्छी हास्य रचना है।

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  7. वाह अच्छी रचना के लिये बधाई स्वीकार करें

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  8. अरे भाई आपके अरमान ,आँसुओं को यू ही न बहने दो संघर्ष करो हम आपके साथ है

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  9. इस हास्य रचना के लिये आपको घणी बधाई.

    रामराम.

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  10. Hmm...good one!!
    Deepika

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