Monday, June 15, 2009

आसुँ

आसुँओ से पलके भिगो लेता हूँ
याद तेरी आये तो रो लेता हूँ
सोचता हूँ की भुला दू तुझे
मगर हर बार फैसला बदल देता हूँ

Saturday, May 9, 2009

सफ़र

कुछ खोकर पाया कुछ पाकर खोया
ये खेल कैसा समझ न्ही आया
करके पूरा सफ़र ज़िंदगी का
मे भी चला उस ओर जहा से था आया

मूज़े ये किस सवारी पर ले के चले ये लोग
आँसू से भारी आँखें देखे मेरी ओर
देख देख मुझे क्यू रोते ये मेरे अपने
क्यू ना थकते ये कहते
ना देख सकता जो एक भी आँसू इन आँखो मे
ओर आज आंसूओ क सिवा सब कुछ ले गया इन आँखो से

जब कुछ समझ आया ये क्या हुआ
करने लगा बस यही दुआ
मत कर ऐसा जुदा मेरे खुदा
मे मर कर भी मर ना पाऔगा
जिनके लिया जीता था
उनके लिए तो मौत से भी लड़ जाओंगा

ये मेरी जीत थी या हार
ज़िंदगी के सफ़र मे क्यू न्ही
कर पाया मे जी भर के प्यार
एक दिन दे दे बस मुझे करने के लिए प्यार
फिर हज़ार बार मरने क लिए हो जाओंगा खुद ही त्यार

मुझे ना मिला एक दिन ना ही एक पल
मेरा रुदन ना कर सका कुछ भी हलचल
फिर समझ आया ये जीवन कुछ भी न्ही
फिर भी बहुत कुछ हे इसने अपने मे समाया

Monday, May 4, 2009

ज़िंदगी का खेल

ज़िंदगी जब भी पूछता हू तुझसे सवाल
क्यू खामोश वादियो सी सन्नाटा बन चुप हो जाती हे
मन मे मचा के हलचल
ये तेज़ हवाए जैसे मेरे अरमानो को चीर कर निकल जाती हे

कभी सोचता हू ये जीना कैसे
जिसमे मरने के लिए जीते हे या जीने के लिए मरते हे लोग
किस कशमकश मे दूरी बना के प्यार करते हे लोग

ज़िंदगी तूने जैसी डाली गेंद
हमने भी वैसे ही घूमा दिए बल्ला
कभी एक एक रन को तरसे तो
कभी छकके ही बरसा दिए

ज़िंदगी के इस जुए मे हमने भी दो-दो हाथ किए
लूटा के सब कुछ बस मुस्कुरा कर चल दिए
फिर करके त्यारी एक ओर जुए की
कुछ पाकर हुए त्यार सब हारने की

क्या न्ही था ऐसा जिससे ना था खोया
समज कर खेल ज़िंदगी का फिर एक नया सपना संजोया
हर हार पर इस टूटे दिल को समझाया
की एक नई जीत के स्वागत मे दिल को लागया
कुछ नसमज बना कर इस ज़िंदगी ने बहुत कुछ समझाया

Friday, April 3, 2009

बबर शेर

कृपया इससे मत ही पढ़ेयगा

एक कवीता
सोचता हूँ जब भी इस कवीता के बारे में
भूख लग जाती हे
उसकी बेबसी उसकी बेबसी भी नही देखि जाती हे................
एक कवि था बेचारा सा कवीता में खोया रहता था
चोरी चोरी चुपके चुपके कवीता लिखता रहता था
फिर बी ऐसी कवीता ही लिख डाली
जिससे सुन कर उससे
पढ़ी चपले जूते ओर गाली
वो फिर भी कहता फिरता रहा सभी से
कवि तो हम पहले से थे बस ॥
कविताए नही हे ...................
कैसे भागू कविता के चंगुल से
आख़िर कैसे छुडवायु इससे पीछा
ये तो मुझे बदनाम करके मेरा नाम कर गई हे
ये कविता न्ही ये तो मेरा काम तमाम कर गई हे

माना किया था मत पड़ना फिर भी न्ही माने अब भुग्तो

जिंदगी

ज़िंदगी मेरा भी कभी दरवाजा खटखटाना
मुझसे मिल कर मुझे भी मानना
राहोमें मेरी भी आना
ओर फिर जुदा हो कर मत जाना


ये आँखे भी करती हे तेरा इंतेज़ार
ज़्यादा न्ही बस हर खुशी का करना हे मुझे भी इज़हार
कोई वजा न्ही हे मुस्कुराने की मेरे पास
तो हरमुस्कुराहट को एक वजा बना दे
बस होते हुए भी आँखे नम
मुझे छूकर ले जा सारे गम
समेट कर थोड़ी सी खुशियो की बूंदे
मेरा भी आँचल भिगो दे

सुना कर एक प्यार भारी लोरी
कभी ना टूटने वाली एक मीठी सी नींद सुला दे
जिंदगी मुझे भी अपना बना ले






Tuesday, March 24, 2009

दिल के अरमान आँसुओं में बह गये

दिल के अरमान आँसुओं में बह गये
रोज ऑफीस आने के बाद भी सारे काम अधूरे रह गये
ज़िंदगी भी बोरियत की दुकान बन गई
सारा काम करके भी अप्रेज़ल की शकल को तरस गये
शायद ये आखरी बार पड़ेगी गालिया
हर गाली ये सोच कर सह गये

खुद की नींद की भी दी क़ुर्बानी
पास के ढाबा वाले की चाय पर भी करी कितनी मेहरबानी
सुबा से शाम तक 6 बजने क इंतेज़ार मे हर सितम सह गए
हमारी ओर प्रमोशन के बीच मे फ़ासले ही रह गए
दिल के अरमान आँसुओं में बह गए

Thursday, March 12, 2009

पापा कहते हैं

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
बेटा हमारा इंजिनियर बनके ऐसा काम करेगा
मगर यह तो कोई ना जाने
की कितने लटक लटक के ये कॉमपार्टमेंट हटाई हे
रोज रातो मे दोस्तो क साथ जग जग के कितने पर्चिया बनाई हे
कितनी मुस्किल से ये डिग्री पाई हॅ

Monday, March 9, 2009

क्या खोया क्या पाया

क्या खोया क्या पाया
ये सोचते हुए ही सारा वक़्त बिताया
ज़िंदगी मे राहें बिछड़ती सी रही
मंज़िल भी दूर निकलती सी गई

सोचा तूने एक दिन जी लूँगा ज़िंदगी
ओर हर वक़्त जीने क खवाब साजाता रहा
बस यू ही काल क मूह मे जाता रहा
दिल मे लेकर लाखो सपने ओर भूल कर उनको जो हें अपने
बस अकेला बदता गया आगे आँखो मे भरकर मोती इतने
आस्मा मे तारे हो जीतने......

ये कैसा जीना था तेरा जिसमे जीने क सिर्फ़ खवाब थे
बस ज़िंदगी मे पाने के सिर्फ़ अरमान थे
लकिन कुछ पाने क चकर मे कितना कुछ खोता चला गया तू
जब ये समझा तो जा कर पीछे उनको गला लगना चाहता था बस
उन अपनो को अपना बनाना न्ही बस प्यार से प्यार करना चाहता था बस

लकिन ज़िंदगी से तब दूर निकल गया था तू
अपनी मंज़िल पाने की लड़ाई मे सब कुछ हार गया था तू
मंज़िल भी थी तेरे कदमो मे ये कैसे थी वक़्त की साजिश
अपनो के लिए अपनी जान ही दी लेकिन
उनके साथ की कर भी ना पाया तू गुज़ारिश
फिर सोचा ये क्या खोया ओर क्या पाया.....
ज़िंदगी की इस दौड़ मे तू इतनी दूर अकेला ही चला आया
जहा कुछ न्ही था बस खवाब थे सिर्फ़ जीने के
जीने के ओर सिर्फ़ जीने के..............

Thursday, March 5, 2009

तुम(TUM)

क्यू आते हो तुम बार बार
क्यू तड़पाते हो मुझे हर बार
ये कैसे हा ज़िंदगी का आलम
तुम्हारे आते ही ब्लॅंक हो जाते हॅ दिल क सब रो ओर कॉलम
जैसे जैसे आते हो करीब
हर बार बन जाता हॅ नया नसीब
कुछ पॅलो की हे ये कहानी
जीवन की बना देती हॅ नये ज़िंदगानी
बस दिमाग़ को कर देते हो जाम
ये ओर कोई न्ही ये तो हा बस मेरे एग्ज़ॅम्स..

Wednesday, March 4, 2009

Dil

Mana ki dil b toota zaroor haa
Mana ki zindagi b khafa zaroor haa
magar hum b mana lenge zindagi ko
hum b saja lenge naye sapno ko
kyuki hume b apni kabiliyat par garoor haa

Tuesday, March 3, 2009

ज़िंदगी

ज़िंदगी तेरी साचाई ने रुसवा किया
जन्नत न्ही माँगी थी तुझसे
बस एक खुशी का डीप जलाया था
फिर भी तूने तन्हा किया.................

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